Tuesday , 7 February 2017
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वीर अभिमन्यु

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Veer abhimanyu

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कुरुक्षेत्रमें कौरवोंके रथी-महारथियोंसे अपने प्राणोंको दांवपर लगाकर लडते हुए वीरगतिको प्राप्त होनेवाला अभिमन्यु, अर्जुन एवं सुभद्राका पुत्र था । वह अर्जुनके समान ही शूर-वीर था । वह सभी प्रकारके शस्त्र-संचालनमें प्रवीण था । उस बालवीरद्वारा दिखाए गए अद्भुत शौर्यकी तुलना हो ही नहीं सकती  ।

कौरव-पाण्डवोंके मध्य युद्धके समय द्रोणाचार्य कौरवोंके सेनापति थे । वे पाण्डवोंकी सेनासे निरन्तर पराजित होनेके कारण  दु:खी थे । द्रोणाचार्यने पाण्डवोंको पराजित करने हेतु अपनी सेनाका चक्रव्यूह बनाया । द्रोणाचार्य जानते थे कि इस चक्रव्यूहको केवल अर्जुन एवं श्रीकृष्ण ही भेद सकते हैं । किन्तु, श्रीकृष्णने प्रतिज्ञा की है कि वे अपने हाथोंमें शस्त्र धरण नहीं करेंगे तथा अर्जुन युद्धभूमिसे बहुत दूर युद्ध कर रहा था । अब क्या करें,   यह पाण्डव समझ नहीं पा रहे थे । तभी, अभिमन्युने धर्मराज युधिष्ठिरके समक्ष आकर कहा, ‘‘तातश्री, मुझे आज्ञा दें, मैं इस चक्रव्यूहको भेदकर उसमें प्रवेश कर सकता हूं । आप चिन्तित न हों ।”

धर्मराज अभिमन्युके पराक्रमको जानते थे; परन्तु, एक छोटे बालकको कैसे युद्धमें भाग लेनेकी अनुमति दें, यह उन्हें नहीं सूझ  रहा था । अभिमन्युके हठके आगे विवश होकर उन्होंने उसे चक्रव्यूह भेदनेकी अनुमति दे दी । उस समय अभिमन्युकी अवस्था केवल सोलह वर्ष  थी ।

अभिमन्युने धर्मराज एवं अन्य पाण्डवोंसे आशीर्वाद लेकर कौरवोंद्वारा रचे सैन्य-चक्रव्यूहमें प्रवेश किया । उसके साथ उसकी सेना भी थी । लडते-लडते वह बहुत आगे निकल गया । वह अपनी सेनासे अलग हो गया । तब भी, वह आगे बढ रहा था । अभिमन्यु शत्रुके हाथी, घोडों एवं सेनाका नाश कर रहा था । उसने द्रोणाचार्य एवं अन्य वीरोंको बहुत त्रस्त कर दिया । उसका शौर्य देखकर कौरव भी आश्चर्यचकित हुए । अभिमन्यु लडते-लडते अचेत होकर  भूमिपर गिर पडा । तब, दु:शासनने उसपर गदासे प्रहार किया । इससे अभिमन्युके जीवनका अन्त हुआ ।

बडे-बडे वीरोंपर भारी पडनेवाले छोटेसे वीर अभिमन्युके शवके सिरपर  जयद्रथने अनादरसे लात मारी । यह समाचार सुनकर पाण्डवोंमें प्रतिशोधकी प्रचण्ड भावना जगी । उसी क्षण अर्जुनने अगले दिन सूर्यास्तसे पूर्र्व जयद्रथका वध करनेकी प्रतिज्ञा की । वह प्रतिज्ञा पूर्ण कर अर्जुनने अपने पुत्रके वधका प्रतिशोघ लिया ।

बालको, शौर्य एवं धैर्य हो तो ऐसा । अभिमन्युने छोटी अवस्थामें ही अतुलनीय पराक्रम किया था । किसी भी कार्यमें सफल होनेके लिए पराक्रम करना ही पडता है ।

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