Tuesday , 19 September 2017
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क्यों कहलाते हैं पांचरुपी हनुमान

why-are-they-called-panchuru-hanuman

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जब राम और रावण की सेना के मध्य भयंकर युद्ध चल रहा था और रावण अपने पराजय के समीप था तब इस समस्या से उबरने के लिए उसने अपने मायावी भाई अहिरावण को याद किया जो मां भवानी का परम भक्त होने के साथ- साथ तंत्र – मंत्र का बड़ा ज्ञाता था। उसने अपने माया के दम पर भगवान राम की सारी सेना को निद्रा में डाल दिया तथा राम एवं लक्ष्मण का अपरहण कर, उन्हें पाताल लोक ले गया।

कुछ घंटे बाद जब माया का प्रभाव कम हुआ, तब विभिषण ने यह पहचान लिया कि यह कार्य अहिरावण का है और उसने हनुमानजी को श्री राम और लक्ष्मण की सहायता करने के लिए पाताल लोक जाने को कहा। पाताल लोक के द्वार पर उन्हें उनका पुत्र मकरध्वज मिला और युद्ध में उसे हराने के बाद हनुमान बंधक श्री राम और लक्ष्मण से मिले। हनुमान को पाताल लोक में पांच दीपक, पांच जगह पर, पांच दिशाओं में मिले जिसे अहिरावण ने मां भवानी के लिए जलाए थे।

इन पांचों दीपक को एक साथ बुझाने पर अहिरावन का वध हो जाएगा, उन पांच दीपक को बुझानें और अहिरावण का वध करने के लिए हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धारण किया। उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरुड़ मुख, आकाश की तरफ हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख। इस रूप को धरकर उन्होंने वे पांचों दीप बुझाएं तथा अहिरावण का वध कर श्री राम और लक्ष्मण को उस से मुक्त किया।

पितामह भीष्म के जीवन का एक ही पाप था कि उन्होंने समय पर क्रोध नहीं किया…(द्रोपदी चीर हरण के समय)
और
जटायु के जीवन का एक ही पुण्य था कि उसने समय पर क्रोध किया…..(माता सीता के हरण के समय।)

समय आने पर मृत्यु दोनों की हुई किन्तु…

परिणामस्वरुप एक को बाणों की शैय्या मिली और एक को श्री राम की गोद
वेद कहता है– “क्रोध भी तब पुण्य बन जाता है जब वह धर्म और मर्यादा के लिए किया जाए और सहनशीलता भी तब पाप बन जाती है जब वह धर्म और मर्यादा को बचा ना पाये

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When a fierce battle was going on between the army of Rama and Ravana and Ravana was near his defeat, he remembered his elusive brother Ahiravan, who, along with being the supreme devotee of Mother Bhavani, accompanied the mechanism – Mantra There was a bigger known. He put all the army of Lord Rama on sleeping on his own heart and abducted Ram and Lakshman, took them away from Pataloshi.

After a few hours, when the effects of maya came down, then Vishwishtha recognized that this work is of Ahiravah and he asked Hanumanji to go to Hatham to help the people. At the entrance of the Patalas, he found his son Makarvvaj and after defeating him in battle, Hanuman hosted Shri Ram and Lakshman.

Hanuman found five lamps in five halves in five halves, in which Ahiravana burned for mother Bhavani. Ahiravan will be killed for these five lamps, one after the other, Hanuman ji has assumed the Panchvukhi form to kill those five lampes and the Ahiravana. In the north, the peacock mouth, Narasimha in the south direction, Garuda mouth in the west, Haigoya mouth towards the sky and Hanuman mouth in the east direction By holding on to this form, they extinguished the five lampes and slaughtered Ahiravana and freed Shri Ram and Lakshman from it.

There was only one sin in the life of his grandfather Bhishma that he did not get angry at the time … (Draupadi at the time of incision)
And
Jatayu’s life was the only virtue that he was angry at the time … (At the time of the defeat of mother Sita.)

Both of them died when the time came …

As a result, one got the arrow of the arrow and one was the lap of Sri Ram.
The Vedas say, “Anger becomes virtuous even when it is done for religion and dignity and patience also becomes sin when it does not save the religion and the limit

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