अरब देश के गीलान नगर में रहने वाले शेख अब्दुल कादिर बहुत दरियादिल इनसान थे। वे अपना जीवन बहुत सादगी से बिताते थे। सत्साहित्य के पठन-पाठन में वे हमेशा लगे रहते थे।
उनके पड़ोस में एक यहूदी युवक रहता था। वह उच्छृखल किस्म का था। वह बराबर शोर मचाता। इससे शेख कादिर की इबादत में बाधा पड़ती। उन्होंने एक बार उस युवक से कहा, ‘मैं जब इबादत करता हूँ, कम-से-कम उस वक्त तो शोर न मचाओ।’
उस युवक का जवाब था, ‘मैं अपने घर में क्या करता हूँ, इससे किसी को क्या मतलब है? कुछ दिनों बाद शेख साहब ने महसूस किया कि उनके पड़ोस से शोरगुल की आवाजें नहीं सुनाई दे रहीं।
पता करने पर जानकारी मिली कि वह युवक हवालात में है। किसी अपराध में उसे पुलिस ले गई थी। उनके कानों तक यह बात पहुँच गई कि युवक बेगुनाह है।
उन्हें कुरान की शिक्षा याद आई कि बेगुनाह की सहायता करना फर्ज है। वह हाकिम के पास पहुँचे और बोले, ‘यहूदी युवक मेरा पड़ोसी है। यदि उसका जुर्म मामूली है, तो जुर्माने की रकम जमा करके मैं उसे छुड़वाना चाहता हूँ।’
हाकिम साहब शेख साहब से प्रभावित हुए और युवक की फाइल देखी। जाँच करने पर पता चला कि वह युवक वाकई बेगुनाह है । उसे रिहा कर दिया गया।
यह देखकर वह युवा शेख कादिर साहब के चरणों में झुक गया और माफी माँगने लगा। शेख साहब ने उससे कहा कि एक सच्चे मुसलमान का फर्ज है कि वह पड़ोसी के दुःख में काम आए।
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