What is light? Light is where you can see everything. Light is where darkness disappears. Who is enlightened? One who can see everything: good, bad, and neutral. One who sees all and sees God. If you cannot see God in all, you cannot see God at all. Those who seek God inside, find it. Those who seek God outside, waste …
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श्रीकृष्ण अवतार
श्रीकृष्णावतार – प्रभु का साक्षात स्वरूप यह ईश्वर और अवतार का रहस्य दृष्टि में रखकर अब भगवान श्रीकृष्ण के चरित्रों की आलोचना कीजिए, तो स्फुटरूप से भासित हो जाएंगा कि वे ‘पूर्णावतार’ हैं । दुराग्रह छोड़ दिया जाएं तो विवश होकर कहना ही पड़ेगा कि ‘कृष्णस्तु भगवान्स्वयम्’ (श्रीकृष्ण साक्षात् भगवान – परब्रह्म परमेश्वर हैं ) । पहले बुद्धि के …
Read More »महात्मा की कृपा
पुण्यभूमि आर्यावर्त के सौराष्ट्र – प्रांत में जीर्णदुर्ग नामक एक अत्यंत प्राचीन ऐतिहासिक नगर है, जिसे आजकल जूनागढ़ कहते हैं । भक्तप्रवर श्रीनरसिंह मेहता का जन्म लगभग सं0 1470 में इसी जूनागढ़ में एक प्रतिष्ठित नागर ब्राह्मण परिवार में हुआ था । उनके पिता का नाम था कृष्णदामोदर दास तथा माता का नाम लक्ष्मी गौरी । उनके एक और बड़े …
Read More »संसारी – व्यवसायी में भेद
बुद्धि दो तरह की होती है – अव्यवसायात्मिका और व्यवसायात्मिका । जिसमें सांसारिक सुख, भोग, आराम, मान आदि प्राप्त करने का ध्येय होता है, वह बुद्धि ‘अव्यवसायात्मिका’ होती है । जिसमें समता की प्राप्ति करने का, अपना कल्याण करने का ही उद्देश्य रहता है, वह बुद्धि ‘व्यवसायात्मिका’ होती है । अव्यवसायात्मिका बुद्धि अनंत होती है और व्यवसायात्मिका बुद्धि एक होती …
Read More »कर्मयोग
जन्म – जन्मांतर में किये हुए शुभाशुभ कर्मों के संस्कारों से यह जीव बंधा है तथा इस मनुष्य शरीर में पुन: अहंता, ममता, आसक्ति और कामना से नए – नए कर्म करके और अधिक जकड़ा जाता है । अत: यहां इस जीवात्मा को बार – बार नाना प्रकार की योनियों में जन्म – मृत्युरूप संसारचक्र में घुमाने के हेतुभूत जन्म …
Read More »सत् – असत् का ज्ञान
सत् – असत् का विवेक मनुष्य अगर अपने शरीर पर करता है तो वह साधक होता है और संसार पर करता है तो विद्वान होता है । अपने को अलग रखते हुए संसार में सत् – असत् का विवेक करने वाला मनुष्य वाचक (सीखा हुआ) ज्ञानी तो बन जाता है, पर उसको अनुभव नहीं हो सकता । परंतु अपनी देह …
Read More »परिवर्तन ही जीवन
शरीर कभी एकरूप रहता ही नहीं और सत्ता कभी अनेकरूप होती ही नहीं । शरीर जन्म से पहले भी नहीं था, मरने के बाद भी नहीं रहेगा तथा वर्तमान में भी वह प्रतिक्षण मर रहा है । वास्तव में गर्भ में आते ही शरीर के मरने का क्रम (परिवर्तन) शुरू हो जाता है । बाल्यावस्था मर जाएं तो युवावस्था आ …
Read More »व्यर्थ है मोह का बंधन
इतना मिल गया, इतना और मिल जाए फिर ऐसा मिलता ही रहें – ऐसे धन, जमीन, मकान, आदर, प्रशंसा, पद, अधिकार आदि की तरह बढ़ती हुई वृत्ति का नाम ‘लोभ’ है । जहां लड़ाई होती है, वहां समय, सम्पत्ति, शक्ति का नाश हो जाता है । तरह – तरह की चिंताएं और आपत्तियां आ जाती हैं । दो मित्रों में …
Read More »योग – वियोग
जिसके साथ हमारा संबंध है नहीं, हुआ नहीं, होगा नहीं और होना संभव ही नहीं, ऐसे दु:खस्वरूप संसार – शरीर के साथ संबंध मान लिया, यहीं ‘दु:खसंयोग’ है । यह दु:खसंयोग ‘योग’ नहीं है । अगर यह योग होता अर्थात् संसार के साथ हमारा नित्य – संबंध होता, तो इस दु:खसंयोग का कभी वियोग (संबंध – विच्छेद) नहीं होता । …
Read More »स्वामी विवेकानंद जयंती
स्वामी विवेकानंद आधुनिक युग के प्रथम पंक्ति के विश्व प्रसिद्ध महापुरुष थे । वे भारतीयता के आदर्श प्रतिनिधि होने के अतिरिक्त, वैदिक धर्म तथा संस्कृति के ओजस्वी वक्ता भी थे । वेदांत को आज के विज्ञान के सम्मुख जिस हृदयगंम रूप में उन्होंने प्रतिपादित किया यह उन की ओजस्वी प्रतिभा का प्रतिबिंब है । उनके स्फूर्तिदायी विचारों से केवल भारत …
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पौराणिक कथाओं, प्रेरक क्षण, मंदिरों, धर्मों, फिल्मों, हस्तियों के बारे में दिलचस्प जानकारी, हजारों गाने, भजन, आरती के बोल हैं Your wish may come true today…