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एक पत्नीव्रत धर्म

saalaasar ke mandir mein hanumaan viraaje re

श्रीरघुनाथ जी ने अकनारीव्रत को चरितार्थ करके महान आदर्श उपस्थित कर दिया । यद्यपि आपको स्मृतिकारों के प्रमाणनुसार चार विवाहों की प्रचलित प्रथा की मर्यादा स्वीकार थी, परंतु इधर एकपत्नीव्रत को ही पुष्ट करना था । इसलिए एक सीता जी के साथ ही विवाह की चारों रीतियां पूरी कर ली गयीं । जैसे – 1) गांधर्व विवाह फुलवारी में हुआ …

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मौत की भी मौत

Colorful religious krishna janmashtami card background

जो भगवान् के भक्त होते हैं , उनके स्वमी भी भगवान् ही होते हैं । उनपर मौत का अधिकार नहीं होता । अन्यथा चेष्टा करने से मौत की भी मौत हो जाती है । एक बार गोदावरी नदी के तट पर ‘श्वेत’ नाम के एक ब्राह्मण रहते थे । उनका सारा समय सदाशिव की पूजा में व्यतीत होता था । …

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हर – भगवान शिव के अवतार

Ek Bar Bhagwan Narayan Story

शैवागम के अनुसार भगवान रुद्र के आठवें स्वरूप का नाम हर है । भगवान हर को सर्वभूषण कहा गया है । इसका अभिप्राय यह है कि मंगल और अमंगल सब कुछ ईश्वर – शरीर में है । दूसरा अभिप्राय यह है कि संहारकारक रुद्र में संहार – सामग्री रहनी ही चाहिए । समय पर सृष्टि का सृजन और समय पर …

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श्रीराम भक्त

shree raam jee aur shree krshn jee

भगवान श्रीरामचंद्र जी ऐसे शरणागतवत्सल हैं कि जो जीव एक बार भी सच्चे हृदय से उनके शरणागत हो गया, उसके वचन और कर्तव्य की चूक पर फिर कभी दृष्टि न देकर वे केवल उसके ‘हिए’ के निश्चय की ओर ही देखते हैं । वे कतहते हैं कि ‘इस जीवन ने अनन्य गति से मुझको अपना शरण्य निश्चय कर लिया है, …

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श्रीराम मर्यादा चरित्र

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पिता – भक्ति श्रीरघुनाथ जी नित्य प्राय: काल उठकर श्रीपिता जी को नमस्कार करते थे और अपने संपूर्ण कार्य उनकी आज्ञा के अनुसार करके अपनी सेवा से उन्हें प्रसन्न रखते थे । यहां तक कि उन्होंने अयोध्या की चक्रवर्ती राज्यश्री को पिता के वचन के नाते तृणवत् त्यागकर पितृभक्ति का अनुपम आदर्श चरितार्थ कर दिखाया । सारे संसार को आप …

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गीता के उपदेष्टा श्रीकृष्ण

Abhimanu Mahabharat Mahakavye

परब्रह्म पुरुषोत्तम भगवान अपनी माया का अपनी योगमाया का अधिष्ठान करके मनुष्य रूप से सृष्टि में प्रकट होते हैं और संसार – चक्र की स्थानविच्युता धुरी को पुन: सुव्यवस्थित कर, अनेकता में एकत्व का अर्थात् भिन्न – भिन्न रूप से दिखनेवाले व्यक्तियों का मूलस्वरूप एक ही है, यह भान होने के लिए सुविधा प्रदान कर देते हैं । इस बात …

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भगवान शिव का भिक्षुवर्यावतार

krshnadarshan - bhagavaan shiv ke avataar

विदर्भ देश में एक सत्यरथ नाम से प्रसिद्ध राजा थे । धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करते हुए उनका बहुत सा समय सुखपूर्वक बीत गया । तदंनतर एक दिन शाल्व देश के राजा ने उनकी राजधानीपर आक्रमण कर दिया । शत्रुओं के साथ युद्ध करते हुए राजा सत्यरथ की सेना नष्ट हो गयी । फिल दैवयोग से राजा भी शत्रुओं के …

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श्रीभरत जी के विशेषतर धर्म से शिक्षा

Bhagat Ka Adbhut Avdaan

भगवत धर्म अर्थात् भगवत सेवा (श्रीराम भक्ति) ही श्रीभरत जी की भी इष्ट – चर्या थी । यथा – साधन सिद्धि राम पग नेहू । मोहि लखि परत भरत मत एहू ।। परंतु इतना अंतर था कि श्रीलखनलाल की सेवा संयोगवस्था संबंधी अर्थात् भजनरूप की थी । उनको स्वामी की सन्निधि में – हुजूरी में सेवा वियोगावस्थासंबंधी अर्थात् स्मरणरूप की …

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राधा – भाव

Suni Kanha Teri Bansuri

राधा भाव में उपासक और उपास्य में प्रेमाधिक्य के कारण एकरूपता हो जाती है । यही कारण था कि भगवान श्रीकृष्ण राधा जी हो जाते थे और श्रीराधा श्रीकृष्ण बन जाती थीं ।इस प्रकार का परिवर्तन परम स्वाभाविक है । उदाहरणस्वरूप गर्गसंहिता का यह श्लोक है – श्रीकृष्ण कृष्णेति गिरा वदन्त्य: श्रीकृष्णपादाम्बूजलग्नमानसा: । श्रीकृष्णरूपास्तु बभूवुरंगना – श्र्चित्रं न पेशस्कृतमेत्य कीटवत् …

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कपाली – भगवान शिव के अवतार

Rakshak Parbhu

शैवागम के अनुसार दसवें रुद्र का नाम कपाली है । पद्मपुराण के अनुसार एक बार भगवान कपालीब्रह्मा के यज्ञ में कपाल धारण करके गए, जिसके कारण उन्हें यज्ञ के प्रवेश द्वार पर ही रोक दिया गया । उसके बाद भगवान कपाली रुद्र ने अपने अनंत प्रभाव का दर्शम कराया । फिर सब लोगों ने उनसे क्षमा मांगी और यज्ञ में …

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