युद्ध समाप्त होने के बाद राजा की सेना वापस जा रही थी। वे सभी भूखे थे क्योंकि उनकी खाद्य आपूर्ति समाप्त हो गई थी। राजा ने अपने सिपाहियों से अन्न की व्यवस्था करने को कहा। सिपाही पास के एक गाँव की ओर चल दिए।
रास्ते में उन्हें एक किसान मिला। सिपाही उससे बोले, “हमें गाँव के सबसे बड़े खेत में ले चलो।” तभी उनकी नजर वहीं स्थित एक बड़े से खेत पर पड़ी।
सिपाही उस खेत से अनाज एकत्र करने लगे तो किसान ने उन्हें ऐसा करने से मना करते हुए कहा, “मेरे साथ आओ, मैं तुम्हें एक दूसरे बड़े खेत में लेकर चलता हूँ।” सिपाही किसान के साथ हो लिए।
फिर उन्होंने उस खेत से अनाज एकत्र किया और किसान से पूछा, “तुमने हमें उस पहले वाले खेत से अनाज एकत्र करने से मना क्यों कर दिया?” किसान ने जवाब दिया, “क्योंकि वह खेत किसी और का था जबकि यह खेत मेरा है।
मैं कैसे तुम्हें किसी दूसरे के खेत को नष्ट करने देता?” राजा ने जब किसान की दयालुता के बारे में सुना तो उन्होंने उसे बुलाकर फसल के मूल्य स्वरूप स्वर्णमुद्राएँ भेंट की।
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