एक आदत सी हो गयी थी , कॉलोनी के शिव मंदिर के दर्शन के बाद ही कहीं बाहर जाती थी मैं , और… उसी तरह मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते हुए पास के माली के क्वार्टर की ओर देखना भी.. मेरी उसी आदत में शुमार था … क्योंकि वहाँ का दृश्य ही कुछ ऐसा था, जिसे देखने के लिए मेरे कदम ठिठक ही जाते थे..
माली के क्वार्टर में एक छोटा सा बच्चा था जिसकी उम्र होगी लगभग दस साल ..उसके खाने का समय और मेरे जाने का समय भी तय था मानो.. एक एक सीढ़ी चढ़ते हुए रुककर उस बच्चे को खाते हुए देखना बहुत सुकून देता था मुझे .. उसके कटोरे में कुछ ख़ास नहीं “पानी वाले भात के साथ में प्याज़ …कभी-कभी सब्ज़ी रहती और न हो तो..वो भात का कौर गुटक कर अचार के बड़े मज़े से चटकारे लिया करता था..
तो कभी कभी हरी मिर्च को चबाते हुए हा… हा… हा करके भात के पानी को सुड़ककर पीते हुए उसे अपलक देखा करती थी मैं …! ” पर आज, आज जब मैं मंदिर गई तो वो बच्चा… खाना लेकर तो बैठा था, पर …आज वो मुँह बिगाड़ते हुए बेमन से खा रहा था..! पता नहीं क्यूँ मेरे दिमाग़ में आया कि हो सकता है
उसे भी आज कुछ ख़ास खाने की इच्छा हो रही होगी.. ये सोचते हुए मैं जल्दी से मंदिर में दर्शन करके सामने ही चौक से समोसा जलेबी ख़रीदकर उसी क्वार्टर में पहुंचीं.. बच्चे से मेरा परिचय हुआ तो नहीं था, पर, हाँ… हमारी आँखें अवश्य एक दूसरे की मित्र बन चुकी थीं, क्योंकि रोज़ मेरी और उसकी निगाहें मिलते ही हम दोनों ही मुस्कुरा दिया करते थे ..
या यूँ कहें कि किसी तय शुदा काम की तरह हमारा ये मौन वार्तालाप होता ही रहता था …इसलिये तो उसने मुझे देखते ही मुस्कुरा कर मेरा स्वागत किया.. तो चहकते हुए मैंने भी उसे नाश्ते का थैला पकड़ा दिया.. तभी तत्काल, मेरे दिमाग़ में ख्याल आया कि नाश्ते की खुशबु मिलते ही वो उस पर अवश्य टूट पड़ेगा… पर, ऐसा तो कुछ भी नहीं हुआ.. मैंने निराश होकर उससे कहा – “बच्चे थैला खोलकर तो देखो.. क्या है उसमें..?”
“दीदी, थैंक यू ! पर क्यों लाया आपने मेरे लिए तो माँ ने खाना बना ही दिया है…!”
“वो… वो क्या है न… आज तुम्हारा… अनमना सा चेहरा देखकर मैंने सोचा..!” मैं हिचकिचा कर बोली ..
“नहीं दीदी आज माँ की तबियत ठीक नहीं है न.. बाउजी उन्हें हॉस्पिटल लेकर गये हैं तो मन थोड़ा ख़राब है मेरा … नहीं तो, माँ जो भी बनाती है न …पता नहीं उसमें क्या मिला देती है… भगवान के भोग की तरह लगता है मुझे..! “
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