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मन का सौंदर्य !!

भगवान बुद्ध के शिष्य उपगुप्त परम सदाचारी थे।वह भिक्षुओं से कहते थे कि प्रेम और संयम ही भौतिक व आध्यात्मिक विकास के साधन हैं।समाज द्वारा बहिष्कृत लोगों से प्रेम करनेवाला ही सच्चा धार्मिक है।

एक दिन एक अति सुंदरी उपगुप्त के पास पहुंची। उपगुप्त उसे देख आकर्षित हो गए।परन्तु उसी समय उन्हें बुद्ध के वचन याद आए कि शारीरिक सौंदर्य नहीं , मन के सौंदर्य में सच्चा आकर्षण होता है। सुंदरी भी उपगुप्त को देखते ही उनसे प्रेम कर बैठी।उसने उपगुप्त से प्रार्थना की कि वह उसके साथ कुछ क्षण विताकर उसे उपकृत करें।

उपगुप्त ने वचन दिया कि वो उपयुक्त समय आने पर उससे एक बार अवश्य मिलेंगे।समय बीतता गया।भोग विलास में रहने के कारण युवती का शारीरिक सौंदर्य नष्ट हो गया।और उसे अनेक रोगों ने घेर लिया।लोगों ने कुलटा बताकर उसे नगर से निकाल दिया।

वह एक जंगल में दयनीय हालत में अपने अंतिम दिन बिताने लगी।उपगुप्त को युवती की दुर्दशा का पता चला।वो तुरन्त उससे मिलने जा पहुंचे।उन्हें देखते ही युवती की आंखों से आंसू निकलने लगे। उपगुप्त ने उसके बगल में बैठ कर उसके सिर पर बड़े प्यार से हाथ फेरा।

वह आश्चर्य होकर बोली “जब मैं प्रेम करने योग्य थी।तब आप मेरे पास नहीं आये।अब जब मेरा शारीरिक सौंदर्य नष्ट हो गया। आप तब आये हैं। अब आने का क्या लाभ? उपगुप्त ने कहा “देवी , शारीरिक आकर्षण को प्रेम नहीं वासना कहते हैं। मैं आज भी तुमसे प्रेम करता हूं।क्योंकि यही सच्चा प्रेम हैं “।यह सुन वह युवती मन ही मन प्रसन्न हो उठी ।

Moral Of The Story (मन का सौंदर्य)

तन की सुंदरता उम्र ढलने के साथ ही खत्म हो जाती है।यह अस्थाई है। लेकिन मन की सुंदरता हमेशा इंसान को खुबसूरत , लोकप्रिय और जवान बनाए रखती है।और यह कभी नष्ट नहीं होती है।

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