मदनलाल ढींगरा लंदन के इंडिया हाउस से जुड़े रहकर भारत की स्वाधीनता के लिए प्रयासरत थे। विनायक दामोदर सावरकर से प्रेरणा लेकर उन्होंने 1 जुलाई, 1909 को इंपीरियल इंस्टीट्यूट में आयोजित समारोह में सर कर्जन वायली पर सरेआम गोलियाँ बरसाकर उसकी हत्या कर दी।
उन्हें फाँसी की सजा सुनाई गई । मदनलाल ढींगरा ने जेल से एक वक्तव्य जारी कर निर्भीकतापूर्वक कहा था, ‘एक हिंदू होने के नाते मैं विश्वास करता हूँ कि अंग्रेजों के हाथों मेरे देश का जो अनादर और अपमान हो रहा है,
वह वास्तव में परमात्मा का अपमान है। मेरी मान्यता है कि राष्ट्र का काम राम और कृष्ण की आराधना है। एक अक्षम पुत्र होने के नाते मैं अपने रक्त के अतिरिक्त माता के पावन चरणों में और क्या अर्पित कर सकता हूँ!’
ढींगरा ने वक्तव्य के अंत में अपनी अंतिम कामना व्यक्त करते हुए कहा, ‘मैं पुनः भारत माता की गोद में जन्म लूँ और देश को स्वाधीन कराने के काम में लग जाऊँ । प्रभु से यही प्रार्थना है कि भारत के स्वतंत्र होने तक मैं बार-बार मृत्यु का वरण करूँ और पुनः जन्म लेता रहूँ । ‘
17 अगस्त, 1909 को इस भारतीय देशभक्त युवक को लंदन की पैटन विले जेल में फांसी पर चढ़ा दिया गया। उनकी इच्छा के अनुसार पूर्ण धार्मिक हिंदू विधि-विधान से उनकी अंत्येष्टि की गई। इस अनूठे राष्ट्रभक्त युवक के बलिदान की बड़ी धूम-धाम से शताब्दी मनाई गई।
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