अपने बचपन की कुछ भावुक यादें जो मम्मी पापा के संघर्ष की कहानी है, आपसे साझा कर रही हूं।
उन दिनों पैसे कमाने के लिए बहुत कठोर परिश्रम लगता था। मेरे पापा फ़ौज में थे और मम्मी ने इंटर पास किया था पर नौकरी नहीं करती थीं क्योंकि तब औरतों का नौकरी करना ज़रूरी नहीं होता था। पापा अपनी पोस्टिंग पर रहते और मम्मी संयुक्त परिवार में हम तीनों बच्चों के साथ पापा के भेजे हुए बहुत ही सीमित पैसों से घर चलातीं। हमारे परिवार में दादा-दादी और मेरे दो छोटे चाचा भी साथ ही रहते थे। इतना बड़ा परिवार और सीमित आमदनी। दादी ने मम्मी को नौकरी करने के लिए प्रोत्साहित किया और मम्मी ने टीचर ट्रेनिंग कर के सरकारी नौकरी ले ली। अब संघर्ष और बढ़ गये थे मम्मी के। मम्मी दिन रात मेहनत करती और दादा-दादी मम्मी को खूब सरहाते।
दादी मम्मी को कठिन मेहनत करते देखती तो उन्हें मम्मी से सहानुभूति होती तो कभी उनका स्नेह उमड़ आता जो मेरे बड़े चाचा को फूटी आंख ना भाता। छोटे चाचा बहुत नर्म दिल के थे वो मम्मी की मदद करते तो जैसे तैसे घर की गाड़ी चलती। मम्मी सुबह मुंह अंधेरे उठती सारे परिवार की देखभाल करती फिर नौकरी पर जातीं और वापिस आकर फिर जुट जातीं। हमने कभी मम्मी को खाते हुए यां सोते हुए देखा ही नहीं था। बस दौड़ती ही रहती थीं। दिन में जब कभी काम निपट जाता तो हमें पढ़ाने बैठ जातीं। पापा जब छुट्टी पर आते तब मम्मी के चेहरे पर कुछ तो सुकून दिखता पर तब पापा के सब रिश्तेदार मिलने आते और मम्मी उनकी आवभगत में लगी रहतीं। मम्मी की सब तारीफ करते और अच्छी पत्नी, अच्छी बहू, अच्छी मां बनी रहने का आशीर्वाद देते। तब मैं इतनी छोटी थी कि मम्मी के मन की व्यथा नहीं समझ पाती थी पर जब आज सोचती हूं तो लगता है क्या मम्मी का मन कभी आराम करने का नहीं होता होगा, क्या कभी इच्छा नहीं होती होगी ये सब छोड़कर कहीं चली जायें और सुकून की सांस लें।
मम्मी ने कभी कोई नया कपड़ा नहीं सिलवाया। मम्मी के पास दो ही साड़ियां थीं जिन्हें वो रोज़ धोती और पहनती थीं। हां हमें दिन त्यौहार पर नये कपड़े ज़रूर सिलवाकर देती थीं। ये 1971 की घटना है जब बांग्लादेश युद्ध चल रहा था और युद्ध में पापा लापता हो गए थे और तीन महीने तक उनकी कोई चिट्ठी नहीं आई थीं। मम्मी का रो रोकर बुरा हाल था। उन्हें किसी चीज़ की सुध ही नहीं थी । दिन रात पापा की सलामती के लिए ईश्वर से प्रार्थना करती रहती थीं। तब हमारे घर में टी वी भी नहीं हुआ करता था।
मम्मी की एक मित्र अपने टी वी पर न्यूज़ दिखाने के लिए मम्मी को अपने घर बुलाती ताकि न्यूज़ क्लिप में युद्ध की तस्वीरों में मम्मी पापा को पहचान सकें। मम्मी के सामने कोई कुछ नहीं कहता पर सबको लग रहा था पता नहीं पापा जीवित भी हैं यां नहीं। तीन महीने बाद पापा का पत्र मिला और उनकी सलामती का पता चला। घर में रिश्तेदारों का आना जाना शुरू हो गया। लोग पापा की सलामती की बधाईयां दे रहे थे। आज मैं मम्मी को वापिस उसी स्फूर्ति से सबकी आवभगत करते देख रही थी। मम्मी के लिए पापा का सिर्फ होना ही उनके जीवन का आधार था। पापा ने फ़ौज की नौकरी में बहुत मान सम्मान पाया पर मेरी समझ से मम्मी का बलिदान पापा के उन सभी प्रशस्तियों से ऊंचा रहा पर शायद हमारा समाज स्त्री की इन सेवाओं को उसका धर्म मानकर उसे कोई प्रशस्ति देने से कतराता है।

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