Sunday , 3 March 2019
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जिंदगी में चाहिए सफलता, तो सहिष्णुता का गुण अपनाएं –

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महात्मा सरयूदास का जन्म गुजरात के पारडी नामक गांव में हुआ था। उनका बचपन का नाम ‘भोगीलाल’ था। बचपन में उन्हें अपने पड़ोसी ‘बजा भगत’ का सत्संग मिला। सरयूदास जी की शिक्षा-दीक्षा बहुत थोड़ी थी।

 सरयूदास अपने मामा के ही घर पर रहकर उनके व्यापार का कार्य संभालते थे। कुछ दिनों के बाद सरयूदास का विवाह हो गया। पर उनकी पत्नी अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सकी।
एक बार की बात है, सरयूदास रेलगाड़ी से कहीं जा रहे थे। गाड़ी में भारी भीड़ थी। कहीं तिल रखने का स्नान भी नहीं था। संतजी के पास ही एक मजबूत कद काठी का व्यक्ति बैठा था।
वह बार-बार संत की ओर पैर बढ़ाकर ठोकर मार देता था। संत सरयूदास ने बड़े दयाभाव से कहा, ‘भाई संकोच मत करना। लगता है तुम्हारे पैर में कहीं पीड़ा है और उस पीड़ा को दिखाने के लिए तुम बार-बार अपना पैर मेरी ओर बढ़ाते हो, मगर फिर वापस खींच लेते हो, मुझे कम से कम सेवा का मौका तो दो। मुझे तुम अपना ही समझो।’
संत ने उसका पैर उठाकर अपनी गोद में रख लिए और उसे सहलाने लगे। वह यात्री शर्मिन्दा हुआ और क्षमा याचना करते हुए कहने लगा, ‘महाराज मेरा अपराध क्षमा करें। आप महात्मा हैं। यह बात मुझे अब पता चली है।’
संक्षेप में
सहनशीलता ऐसा गुण है, जिसे हमें अपने अंदर विकसित करना चाहिए। क्योंकि व्यक्ति का सहनशील होना उसे इस दुनिया में आगे ले जाता है।
Hindi to English

Mahatma Sarayudas was born in a village called Pardi in Gujarat. His childhood name was ‘Bhogilal’. In childhood he got the satsang of his neighbor ‘Baad Bhagat’. The education initiation of Sirius Das was very little.

Sirius lived on his maternal house and took charge of his business. After a few days, Sarayudas got married. But his wife could not survive for more days.

Once upon a time, Sarayudas was going somewhere from the train. There was a huge crowd in the car. There was not even a sesame bath. The person of a strong stick was sitting beside Saint Ji.

He repeatedly stabbed towards the saint and stabbed him. Saint Sirusudas said with great pity, ‘Brother, do not hesitate to do so. It seems like there is a pain in your feet, and to show that pain you increase your legs again and again, but then pull back, let me have the chance to serve at least. Treat me as your own. ‘

The saint raised his leg and kept it in his lap and began to caress him. The traveler became embarrassed and apologized, saying, ‘Sir, forgive my crime. You are a Mahatma. I know this thing now. ‘

in short

Tolerance is such a quality, which we should develop within ourselves. Because being tolerant of the person takes it forward in this world.

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