मैं हरि बिन क्यूं जिऊं री माई॥ पिव कारण बौरी भई, ज्यूं काठहि घुन खाई॥ मैं हरि बिन क्यूं जिऊं री माई॥ ओखद मूल न संचरै, मोहि लाग्यो बौराई॥ मैं हरि बिन क्यूं जिऊं री माई॥ कमठ दादुर बसत जल में जलहि ते उपजाई। मैं हरि बिन क्यूं जिऊं री माई॥ मीन जल के बीछुरे तन तलफि करि मरि जाई॥ …
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