दोहा: सद्गुरु जिन का नाम है, मन के भीतर धाम है ऐसे दीनदयाल को मेरा बार बार प्रणाम है कैसे करूँ मैं वंदना, ना स्वर है ना आवाजआज पृख्शा है मेरी, मेरी लाज राखो गुरु आप कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हसे हम रोएऐसी करनी कर चलो, हम हसे जग रोए तीन लोक नव खंड में, गुरु से बड़ो …
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जब से गुरु दर्श मिला मनवा मेरा खिला खिला
पूछो मेरे दिल से यह पैगाम लिखता हूँ, गुजरी बाते तमाम लिखता हूँ दीवानी हो जाती वो कलम, हे गुरुवर जिस कलम से तेरा नाम लिखता हूँ
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