एक लोमड़ी भोजन की तलाश में जंगल में भटक रही थी. एक पेड़ के पास से गुजरते हुए उसकी नज़र ऊँची डाल पर बैठे कौवे पर पड़ी. वह ठिठक गई. ऐसा नहीं था कि लोमड़ी ने पहले कौवा नहीं देखा था. लेकिन जिस चीज़ ने उसका ध्यान आकर्षित किया था, वह उस कौवे की चोंच में दबा हुआ रोटी का टुकड़ा था.
‘अब कहीं और जाने की ज़रुरत नहीं. ये रोटी अब मेरी है.’ – चालाक लोमड़ी ने मन ही मन सोचा और पेड़ के नीचे जाकर खड़ी हो गई. फिर ऊपर सिर उठाकर मीठी आवाज़ में कौवे से बोली, “शुभ-प्रभात मेरे सुंदर दोस्त.”
लोमड़ी की आवाज़ सुनकर कौवे ने अपना सिर नीचे झुकाया और लोमड़ी को देखा. लेकिन अपनी चोंच उसने कसकर बंद रखी और लोमड़ी के अभिवादन का कोई उत्तर नहीं दिया.
“तुम कितने सुंदर हो दोस्त…” लोमड़ी ने अपनी बोली में पूरी मिठास झोंक दी, “देखो तुम्हारे पंख कैसे चमक रहे हैं? तुम जैसा सुंदर पक्षी मैंने आज तक नहीं देखा. तुम विश्व के सबसे सुंदर पक्षी हो. मेरे ख्याल से तुम तो पक्षियों के राजा हो.”
कौवे ने अपनी इतनी प्रशंषा आज तक नहीं सुनी थी. वह बहुत खुश हुआ और गर्व से फूला नहीं समाया.
लेकिन उसने अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी. इधर लोमड़ी प्रयास करती रही, “दोस्त! मैं सोच रही हूँ कि जो पक्षी इतना सुंदर है, इसकी आवाज़ कितनी मीठी होगी? क्या तुम मेरे लिए एक गीत गुनगुना सकते हो?”
लोमड़ी के मुँह से अपनी आवाज़ की प्रशंषा सुनकर कौवे से रहा न गया. वह गाना गाने के लिए मचल उठा. लेकिन जैसे ही उसने गाना गाने के लिए अपना मुँह खोला, उसकी चोंच में दबा रोटी का टुकड़ा नीचे गिर गया.
नीचे मुँह खोले खड़ी लोमड़ी इसी फिराक़ में थी. उसने रोटी झपट ली और चलती बनी.
सीख
“चापलूसों से बचकर रहो.”
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