हम लोग कानपुर में रहते थे मेरा छोटा बेटा उमेश अपनी पत्नी और बच्चों के साथ हमारे संग रहता था और हमारा बड़ा बेटा बच्चों के साथ सूरत रहता था। कानपुर में ही हमारे पड़ोस में गुप्ता जी सपरिवार रहते थे उनके यहॉं हमारा आना-जाना अच्छा -खासा था।
एक दिन मेरे बड़े बेटे का सूरत से फोन आया बोला -मम्मी -पापा आप कुछ दिनों के लिए हमारे यहाॅं सूरत आ जाईए मैं
आप लोगों को लेने कानपुर आ जाऊॅंगा। मैं और हमारे साहब(पतिदेव) बड़े बेटे राजेश के साथ सूरत चले गए, वहाॅं हमलोंगो को छ: साथ महीने लग गये,उसी बीच कानपुर में मेरे छोटे बेटे उमेश का फोन आया उसने हमलोंगो को बताया पड़ोस वाले गुप्ता अंकल नहीं रहे।
उनको हार्ट-अटैक आया था,उसी में चल बसे, सुनकर मुझे बहुत दु:ख हुआ। जब हमलोग कानपुर अपने छोटे बेटे के पास आये तो दो-चार दिन बाद मैं शाम को गुप्ता जी के घर उन लोगों से मिलने उनलोंगो के घर चली गई।
गुप्ता जी की मिसेज मुझे देख कर बहुत रोईं और वो मुझे पहले की अपेक्षा कमजोर भी काफी लगीं, मैं उनको दिलासा देकर थोड़ी बैठकर अपने घर वापस आ गई।
मुझको उनके अकेले रह जाने पर लगाव भी बहुत हो गया था, मैं उनके घर जब-तब चली जाती थी।आज जब मैं उनके घर गयी तो वो मुझे देख कर जार-जार रोने लगीं, मैं भी उनका रोना देख कर परेशान हो गयी।
मैंने उनको चुप कराया, और ऑंसू पोछे, थोड़ा शांत होने पर वो मुझको बताने लगी -इनके जाने के बाद मेरे दोनों बेटे अलग-अलग हो गये, एक नीचे की मंजिल में दूसरा ऊपर की मंजिल में रहता है।इन लोगों ने मेरा खाना भी पन्द्रह -पन्द्रह दिन के लिये बांध दिया ।पन्द्रह दिन बड़ा बेटा खिलाता है, पन्द्रह दिन छोटा बेटा खाना खिलाता है। अब इन लोगों ने पन्द्रह -पन्द्रह दिन के लिए आपस में ही तय कर लिया है, जब महीना ३१ दिन का होता है तब बड़ी मुश्किल होती है उस दिन ना खाना ना पीना।आज ३१ तारीख है सुबह से मैं भूखी -प्यासी बैठी हूॅं अभी तक खाना तो दूर चाय तक नसीब नहीं हुई है।छोटी बहू को बुला कर चाय के लिए कहा भी वो कहने लगी -अम्मा कल पहली तारीख से हम तुमको खाना देंगे आज हमारी बारी नहीं है।
अब तुम्हीं बताओ मीरा (मेरा नाम मीरा है) मैं इस एक दिन खाने-पीने को तरस जाती हूॅं , समझ में नहीं आता मैं क्या करुॅं।
मुझे उनकी बातें सुन कर बहुत सदमा लगा, मैं सोचने लगी मॉं अपने बच्चों को इतने लाड़-प्यार से पालती है। अपने बच्चों को खाना खिलाकर खुद खाना खाती है और जब बच्चे बड़े हो जाते हैं तो अपने मॉं -बाप को खाना भी नहीं खिला पाते हैं, अपनी -अपने बारी बांध लेते हैं। मुझे उनके लिए बहुत दु:ख हो रहा था कि बेचारी वो भूखी-प्यासी बैठी हैं उनके बच्चों को कोई मतलब नहीं है।
उस दिन तो मैं उनको बहला कर अपने घर ले आई , उनसे मैंने कहा -थोड़ा बाहर निकलोगी आपका मन भी बहलेगा,घर लाकर पहले मैंने उनको खाना दिया थोड़ा ना-नुकुर के बाद उन्होंने खाना खा लिया बाद में हम दोनों ने चाय पी।एक डेढ़ घंटे वो हमारे घर रहीं फिर उसके बाद मैं उनको उनके घर छोड़ आई | घर आकर मैं बहुत उदास हो कर सोचने लगी आज तो मैंने उन्हें खाना खिला दिया अब दूसरे महीने जब ३१तारीख आयेगी तो उस दिन उनके बच्चे तो खाना खिलायेंगे नहीं। क्या वो दिन भर उपवास रखेंगी , मैं यह सब सोच -सोच कर परेशान हो रही थी।
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