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रिश्तों का सम्मान

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ओहो रामू तीन दिनों से समझा रही हूं तुझे कि वो एसी वाला कमरा राजन बाबू के लिए तैयार करना है ये नई वाली चादरें भी उसी कमरे के लिए निकाली थी मैने... तूने यहां इस कमरे में क्यों बिछा दीं..सुमित्रा जी रामू पर बिगड़ रही थीं।

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प्राकृतिक प्रकोप

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जिसे उसने अपनी पत्नी के गहने बेचकर और कुछ कर्ज लेकर खरीदा था । जहां आज शाम ही उसने लहलहाती गेंहू की बालियों को देखा था। नजर लगने के डर से जी भर के देख भी ना पाया था। सही तो है किसान का खेत उसकी फसल उसके बच्चे की तरह होती है।

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सबसे ज्यादा प्लेटफॉर्म वाला रेलवे स्टेशन

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biggest-railway-station ये है सबसे ज्यादा प्लेटफॉर्म वाला रेलवे स्टेशन! एकसाथ खड़ी हो जाती हैं 44 ट्रेनें, क्या आपको पता है? कहां हैनई दिल्ली 26 जुलाई । ट्रेन पकड़ने के लिए प्लेटफॉर्म के चक्कर तो आपने भी लगाए होंगे. स्टेशन पहुंचने के बाद सबसे बड़ी दिक्कत यही आती है कि सारा सामान लेकर प्लेटफॉर्म तक कैसे पहुंचें.इसकी संख्या 10 तक हो …

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हाथ से डुलाने वाला पंखा

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how-recent-times-worker-use-fan प्रचलन में था जो छत पर लगा रहता और एक रस्सी द्वारा कोई प्राणी डुलाता रहता।चूँकि विद्युतीकरण उस समय हुआ नहीं था हाथ से डुलाने वाला ये पंखा बड़े अमीर वर्ग में ख़ासा प्रचलन में था। अंग्रेज़ी हुकूमत के दौरान ऐसे पंखों का खूब प्रयोग हुआ। अनेक भारतीय मज़दूर को पंखा डुलाने के लिए अंग्रेज़ी अफ़सर रखते थे। अमूमन …

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मेहरबाई टाटा

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कहानी उस महिला की जिसने टाटा स्टील कंपनी को दी थी अलग पहचान। टाटा ग्रुप कंपनी से तो आज हम सब वाकिफ हैं। इस कंपनी ने देश के लिए कई दान-धर्म के काम किए हैं। एक वक्त ऐसा भी था,जब यह कंपनी डूबने के कगार पर थी। उस समय जो महिला सबसे आगे निकल कर आई थीं, वह महिला थीं …

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घमंडी बाप को सबक सिखाया

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आज उनको समझ आ गया था कि कितने भी बड़े पद पर रहो मान प्रतिष्ठा रहे पर घर में परिवार में एक सामन्य इंसान बनकर रहना चाहिए |

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गाँवी खुशियों का चॉकलेट: एक परिवर्तन की कहानी

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खाली पैसे बचाने के चक्कर में ढंग से खाता-पीता भी नहीं क्या!" "बारह घंटे की ड्यूटी है अम्मा, बैठकर थोड़े खाना है! ये लो, तुम्हारी मनपसंद मिठाई!"--कहकर उसने मिठाई का डिब्बा माँ को थमा दी!

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स्वस्थ शरीर से बढ़कर कोई पूंजी नहीं

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उसके पास पैसे की कोई कमी नहीं थी लेकिन वह बहुत ज़्यादा आलसी था। अपने सारे काम नौकरों से ही करता था और खुद सारे दिन सोता रहता या अययाशी करता था। वह धीरे धीरे बिल्कुल निकम्मा हो गया था| उसे ऐसा लगता जैसे मैं सबका स्वामी हूँ क्यूंकी मेरे पास बहुत धन है मैं तो कुछ भी खरीद सकता हूँ। यही सोचकर वह दिन रात सोता रहता था| लेकिन कहा जाता है की बुरी सोच का बुरा नतीज़ा होता है।

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मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा

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छोटा सा गाँव था,और छोटी सी दुकान थी उनकी। ईमानदारी से दुकान चलाते थे और इज्जत से रहते थे। तीन बेटे थे उनके, दुलीचंद,माखन और सेवा राम। गाँव में सिर्फ आठवीं तक का स्कूल था, आगे की पढ़ाई के लिए शहर जाना पड़ता था

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रिटर्न गिफ़्ट

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एक दिन मिसेज़ शर्मा अग्रवाल जी के घर आईं और बोलीं कि कल हमारे बंटी का जन्मदिन है,अपने दीपू को शाम 5 बजे भेज दीजिएगा।बस तभी से श्रीमती अग्रवाल परेशान थीं कि अब उपहार में क्या दें।यहाँ तो सब्ज़ियाँ खरीदी जाती नहीं, अब गिफ़्ट कहाँ से खरीदे।फिर उनके दिमाग में एक आइडिया आया।

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