भगवान रुद्र ने ओषधियों का निर्माण करके जगत का इतना कल्याण किया है कि वेद ने भी भगवान शंकर सम्पूर्ण शरीर को ही भेषज मान लिया है । कहा है कि – या ते रुद्र शिवा तनू शिवा विश्वस्य भेषजी । शिवा रुद्रस्य भेषजी तया नो मृड जीवसे ।। सचमुच आयुर्वेद भगवान शिव के रूप में ही अभिव्यक्त हुआ था, …
Read More »Story Katha
सबसे बड़ा दान क्या है ?
यज्ञ में युधिष्ठिर से प्रश्न किया गया ‘श्रेष्ठ दान क्या है’ ? इस पर युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, ‘जो सत्पात्र को दिया जाएं । जो प्राप्त दान को श्रेष्ठ कार्य में लगा सके, उसी सत्पात्र को दिया दान श्रेष्ठ होता है । वहीं पुण्यफल देने में समर्थ है ।’ कर्ण ने अपने कवज का शिवि ने अपने मांस का, जीमूतवाहन …
Read More »दक्षिणा क्यों है महत्त्वपूर्ण
दक्षिणा प्रदान करने वालों के ही आकाश में तारागण के रूप में दिव्य चमकीले चित्र हैं, दक्षिणा देने वाले ही भूलोक में सूर्य की भांति चमकते हैं, दक्षिणा देने वालों को अमरत्व प्राप्त होता है और दक्षिणा देने वाले ही दीर्घायु होकर जीवित रहते हैं । शास्त्रों में दक्षिणारहित यज्ञ को निष्फल बताया गया है । जिस वेदवेत्ता ने हवन …
Read More »गुरु का महत्त्व क्यों ?
भारतीय संस्कृति में ‘आचार्य देवो भव’ कहकर गुरु को असीम श्रद्धा का पात्र माना गया है । गुरु शब्द में ‘गु’ का अर्थ अंधकार तथा ‘रु’ का दूर करने से लगाया जाता है । अर्थात जो अंधकार को दूर कर सके, वहीं गुरु है । वैसे, हमारे शास्त्रों में गुरु के अनेक अर्थ बताएं गए हैं । गुरु का महत्त्व …
Read More »संस्कार क्या हैं ?
भारतीय संस्कृति में संस्कार का साधारण अर्थ किसी दोषयुक्त वस्तु को दोषरहित करना है । अर्थात् जिस प्रक्रिया से वस्तु को दोषरहित किया जाएं उसमें अतिशय का आदान कर देना ही ‘संस्कार’ है । संस्कार मन:शोधन की प्रक्रिया हैं । गौतम धर्मसूत्र के अनुसार संस्कार उसे कहते हैं, जिससे दोष हटते हैं और गुणों की वृद्धि होती है । हमारे …
Read More »भगवान श्रीकृष्ण
श्रीविष्णु भगवान के मुख्य दस अवतारों में श्रीकृष्णावतार को जो महत्त्व प्राप्त है, वह अन्य किसी अवतार को नहीं है । कुछ लोग यह शंका उठाते हैं कि ‘पूर्णकाम’ अजन्मा भगवान अवतार क्यों लेते हैं ? इसका समाधान स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के वचन से ही हो जाता है । पानी में डूबते हुए अनन्यगति बालक को देखकर वत्सल पिता प्रेमविह्वल …
Read More »कृष्णावतार पर वैज्ञानिक दृष्टि
‘कृष्णास्तु भगवान स्वयम्’ श्रीकृष्णचंद्र साक्षात् भगवान परमेश्वर परब्रह्म हैं – यह आर्यजातिका अटल विश्वास है । श्रीकृष्णचरण से ही भक्तिमंदाकिनी का सुधानिर्झर प्रवाहित होकर शांतिमय प्रवाह से सम्पूर्ण जगत को आप्लावित करता हुआ ब्रह्मांड को वेष्टित कर वहीं पहुंचकर लीन होता है, जिसमें डूबकर सनातन धर्मावलम्बी समाज सदा से अपने – आपको सफलजन्मा कृतकृत्य बनाता आया और आज भी बना …
Read More »त्रिपुरुष – विज्ञान
भगवान कृष्ण ने भगवद्गीता में अपने – आपको अव्यय आत्मा कहा है । इसी अव्ययात्म – स्वरूप का विशेषरूप से स्पष्टीकरण है – लोक में दो पुरुष हैं – एक क्षर, दूसरा अक्षर । इंद्रियों से जो जाने जाते हैं वे सब भूत क्षर हैं, उनमें कूटस्थ – नित्यरूप से रहने वाला – विकृत न होने वाला पुरुष अक्षर कहा …
Read More »श्रीकृष्ण अवतार
श्रीकृष्णावतार – प्रभु का साक्षात स्वरूप यह ईश्वर और अवतार का रहस्य दृष्टि में रखकर अब भगवान श्रीकृष्ण के चरित्रों की आलोचना कीजिए, तो स्फुटरूप से भासित हो जाएंगा कि वे ‘पूर्णावतार’ हैं । दुराग्रह छोड़ दिया जाएं तो विवश होकर कहना ही पड़ेगा कि ‘कृष्णस्तु भगवान्स्वयम्’ (श्रीकृष्ण साक्षात् भगवान – परब्रह्म परमेश्वर हैं ) । पहले बुद्धि के …
Read More »महात्मा की कृपा
पुण्यभूमि आर्यावर्त के सौराष्ट्र – प्रांत में जीर्णदुर्ग नामक एक अत्यंत प्राचीन ऐतिहासिक नगर है, जिसे आजकल जूनागढ़ कहते हैं । भक्तप्रवर श्रीनरसिंह मेहता का जन्म लगभग सं0 1470 में इसी जूनागढ़ में एक प्रतिष्ठित नागर ब्राह्मण परिवार में हुआ था । उनके पिता का नाम था कृष्णदामोदर दास तथा माता का नाम लक्ष्मी गौरी । उनके एक और बड़े …
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पौराणिक कथाओं, प्रेरक क्षण, मंदिरों, धर्मों, फिल्मों, हस्तियों के बारे में दिलचस्प जानकारी, हजारों गाने, भजन, आरती के बोल हैं Your wish may come true today…