शैवागम में रुद्र के सातवें स्वरूप को शिव कहा गया है । शिव शब्द नित्य विज्ञानानंदघन परमात्मा का वाचक है । इसलिए शैवागम भगवान शिव को गायत्री के द्वारा प्रतिपाद्य एवं एकाक्षर ओंकार का वाच्यार्थ मानता है । शिव शब्द की उत्पत्ति ‘वश कान्तौ’ धातु से हुई है, जिसका तात्पर्य यह है कि जिसको सब चाहते हैं, उसका नाम शिव …
Read More »Story Katha
जन्म और मृत्यु क्यों ?
सृष्टि में तीन प्रश्न महत्त्वपूर्ण हैं – हम क्यों जन्म लेते हैं ? हम कैसे जन्म लेते हैं ? मृत्यु के पश्चत हम कहा जाते हैं और कैसे रहते हैं ? वेदांत में इनका एक ही उत्तर है – जिसमें ये तीनों बातें विलीन हो जाती हैं उसे जानो । वह क्या है ? कौन है ? वह ब्रह्मा है …
Read More »आदर्श गृहस्थ
श्रीमद्भागवत के वर्णन से यह पता लगता है कि भगवान श्रीकृष्ण आदर्श गृहस्थ थे । भागवत में वर्णन आता है कि जब श्रीनारद जी के दिल में यह प्रश्न उठा कि एक श्रीकृष्ण 16108 रानियों के साथ कैसे गृहस्था चला रहे हैं । तो इसकी जांच करने के लिए वह द्वारका पहुंचे और भगवान की एक – एक पत्नी के …
Read More »भगवान शिव का अवधूतेश्वरावतार
एक बार देवराज इंद्र देवताओं और बृहस्पति के साथ भगवान शिव का दर्शन करने के लिए कैलाश परिवत पर गए । उस समय बृहस्पति और इंद्र के आगमन कू बात जानकर भगवान शंकर उनकी परीक्षा लेने के लिए अवधूत बन गए । उनके शरीर पर कोई वस्त्र नहीं था । वे प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी होने के कारण महाभयंकर …
Read More »परात्पर श्रीकृष्णावतार का प्रयोजन विमर्श
दीनदयालु भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्णचंद्र के चरित्रावलोकन में सतत निमग्न रहनेवाले, ‘अनन्याश्चिन्तयन्तोमाम्’ इत्यादि वचन के अनुसार पराकाष्ठा की अनन्यतापर आरूढ़ हुए आश्रितों के लिए दीनबंधु परम प्रभु को क्या – क्या नहीं करना पड़ता है ? सब प्रकार की सेवा करना, दूत बनना, सारथि बनना और उसी समय गुरु बनकर उपदेश भी देना इत्यादि अनेक भाव से अपने आश्रितों को प्रसन्न …
Read More »एक पत्नीव्रत धर्म
श्रीरघुनाथ जी ने अकनारीव्रत को चरितार्थ करके महान आदर्श उपस्थित कर दिया । यद्यपि आपको स्मृतिकारों के प्रमाणनुसार चार विवाहों की प्रचलित प्रथा की मर्यादा स्वीकार थी, परंतु इधर एकपत्नीव्रत को ही पुष्ट करना था । इसलिए एक सीता जी के साथ ही विवाह की चारों रीतियां पूरी कर ली गयीं । जैसे – 1) गांधर्व विवाह फुलवारी में हुआ …
Read More »श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु और श्रीकृष्ण भक्ति
सर्वसम्पद पूर्ण – आनंद दायक आकर्षणसत्तायुक्त चिद्घनस्वरूप परमतत्त्व की ओर आकृष्ट चित्कणस्वरूप जीवसमुदाय की जो आकर्षम क्रिया है, उसी का नाम भक्ति है । यद्यपि यह श्रीकृष्ण – बक्ति जीवमात्र का नित्यसिद्ध स्वरूपगत स्वधर्म है, तथापि जीव की जड़बद्ध – दशा में इसका विशेष परिचय मनुष्य शरीर में ही अधिक प्राप्त होता है । संसार में क्या सभ्य, क्या असभ्य, …
Read More »मौत की भी मौत
जो भगवान् के भक्त होते हैं , उनके स्वमी भी भगवान् ही होते हैं । उनपर मौत का अधिकार नहीं होता । अन्यथा चेष्टा करने से मौत की भी मौत हो जाती है । एक बार गोदावरी नदी के तट पर ‘श्वेत’ नाम के एक ब्राह्मण रहते थे । उनका सारा समय सदाशिव की पूजा में व्यतीत होता था । …
Read More »हर – भगवान शिव के अवतार
शैवागम के अनुसार भगवान रुद्र के आठवें स्वरूप का नाम हर है । भगवान हर को सर्वभूषण कहा गया है । इसका अभिप्राय यह है कि मंगल और अमंगल सब कुछ ईश्वर – शरीर में है । दूसरा अभिप्राय यह है कि संहारकारक रुद्र में संहार – सामग्री रहनी ही चाहिए । समय पर सृष्टि का सृजन और समय पर …
Read More »श्रीराम भक्त
भगवान श्रीरामचंद्र जी ऐसे शरणागतवत्सल हैं कि जो जीव एक बार भी सच्चे हृदय से उनके शरणागत हो गया, उसके वचन और कर्तव्य की चूक पर फिर कभी दृष्टि न देकर वे केवल उसके ‘हिए’ के निश्चय की ओर ही देखते हैं । वे कतहते हैं कि ‘इस जीवन ने अनन्य गति से मुझको अपना शरण्य निश्चय कर लिया है, …
Read More »
पौराणिक कथाओं, प्रेरक क्षण, मंदिरों, धर्मों, फिल्मों, हस्तियों के बारे में दिलचस्प जानकारी, हजारों गाने, भजन, आरती के बोल हैं Your wish may come true today…