यह सुदामा कौन हैं ? उनकी पत्नी कौन हैं ? वे तन्दुल कौन से हैं ? इत्यादि । यदि अंत:प्रविष्ट होकर देखा जाएं तो सुदामा की कथा में एक आध्यात्मिक रूपक है – भक्त और भगवान के परस्पर मिलन की एक मधुर कहानी है । इसी रहस्य का किच्छित उद्घाटन थोड़े में किया जाएंगा । ‘दामन’ शब्द का अर्थ है …
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कण- कण में है भगवान्
हमलोग मान लें की भगवान् हैं। अनुभव नहीं भी हो तो शास्त्रों को सुनने से मान लें, दूसरों के कहने से मान लें। सब जगह भगवान् हैं, यह मानते हैं, किन्तु भगवान् दिखते नहीं, सब जगह संसार दिखता है, यदि सब जगह प्रत्यक्ष भगवान् दिखने लग जाय तो यह दानना है। पहले मानना होता है, पीछे जानना होता है। शब्द …
Read More »भाव ऊंचा रहे हमारा
हम को अपना सुधार करना चाहिये। हमारे द्वारा अब ऐसा कोई काम नहीं होना चाहिये, जो हमें खतरे में डालने वाला हो। भाव ऊंचा बनायें। भाव अपना है, अपने अधिकार की बात है। फिर कमी क्यों रहने दें। अनिच्छा- परेच्छा से जो कुछ आकर प्राप्त होता है वह हमारा प्रारब्ध है। कोई भी काम करें उस में ऊंचे-से-ऊंचा भाव रखें। …
Read More »पितृभक्त बालक पिप्पलाद
वृत्रासुर ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था। इन्द्र देवताओं के साथ स्वर्ग छोड़कर भाग गये थे। देवताओं के कोई भी अस्त्र-शस्त्र वृत्रासुर को मार नहीं सकते थे। अन्त में इन्द्र ने तपस्या तथा प्रार्थना करके भगवान् को प्रसन्न किया। भगवान् ने बताया कि महर्षि दधीचि की हड्डियों से विश्वकर्मा वज्र बनावे तो उससे वृत्रासुर मर सकता है। महर्षि दधीचि …
Read More »मातृ- पितृ भक्त श्रवणकुमार
श्रवणकुमार जाति से वैश्य थे। इनके माता-पिता दोनों अन्धे हो गये थे। बड़ी सावधानी और श्रद्धा से ये उनकीसेवा करते थे और उनकी प्रत्येक इच्छा पूरी करने का प्रयत्न करते थे। इनके माता-पिता की इच्छा तीर्थयात्रा करने की हुई। उन्होंने एक कांवर बनायी और उसमें दोनों को बैठाकर कंधे पर उठाये हुए ये यात्रा करने लगे। ब्रह्माण के लिये तो …
Read More »परमात्मा की शरण में है स्वर्ग
परमात्मा में मन लगाना मन को वश में करने का प्रधान उपाय है। अभ्यास और वैराग्य से मन वश में हो सकता है। वैराग्य का तात्पर्य है सारे संसार के तृष्णा का अभाव। संसार के भोगों में जो आसक्ति है। स्त्री, धन, पुत्र, मान बड़ाई में जो तुम्हारी आसक्ति है, उसे हटाकर प्रभु में प्रीति करो, भगवान् की दया, गुण, …
Read More »महात्माओं का प्रभाव
महात्मा पुरुषों की कोई सीमा नहीं होती, जो साधारण महात्मा होते हैं, उनके गुण, प्रभाव, रहस्य कोई नहीं बता सकता और जो भगवान् के भेजे हुए महापुरुष होते हैं उनकी तो बात ही क्या है, वे तो भगवान् के समान होते हैं। यह कह दें तो भी कोई आपत्ति नहीं। भगवान् के दर्शन, भाषण से जो लाभ मिलता है उनके …
Read More »गुरुभक्ति के लिए एकलव्य का त्याग
निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र एकलव्य एक दिन हस्तिनापुर में आया और उसने उस समय के धनुर्विद्या के सर्वश्रेष्ठ आचार्य, कौरव-पाण्डवों के शस्त्र-गुरु द्रोणाचार्य जी के चरणों में दूर से साष्टांग प्रणाम किया। अपनी वेश-भूषा से ही वह अपने वर्ण की पहचान दे रहा था। आचार्य द्रोण ने जब उससे अपने पास आने का कारण पूछा, तब उसने बताया—‘मैं श्रीचरणों के …
Read More »प्रथम पूज्य श्रीगणेश जी
यज्ञ, पूजन, हवनादि के समय पहले किस देवता की पूजा की जाय?’ इस प्रश्न पर देवताओं में मतभेद हो गया। सभी चाहते थे कि यह सम्मान मुझे मिले। जब आपस में कोई निपटारा न हो सका, तब सब मिलकर ब्रह्माजी के पास गये, क्योंकि सबके पिता-पितामह तो ब्रह्मा जी ही हैं और सत्पुरुष बड़े-बूढों की बात अवश्य मान लिया करते …
Read More »परमभक्त हनुमान्
हनुमान् जी महाराज भगवान् के परम भक्त थे। उनमें तीन बात विशेष थी- १- भगवान् के चरणों में रहते थे। भगवान् को छोड़कर एक क्षण भी अलग नहीं होना चाहते थे। जब भगवान् की आज्ञा होती थी, तभी भगवान् की आज्ञा पालन के लिये चरणों से अलग होते थे। २- जब भगवान् की आज्ञा हो गयी तो साथ में रहने …
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